जमशेदपुर पत्रकारिता जनसेवा का माध्यम है या सरकारी विभागों में दबदबा कायम करने का जरिया? लौहनगरी में यह सवाल इसलिए चर्चा का विषय बन रहा है, क्योंकि कुछ लोगों की कथित गतिविधियों को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। आरोप है कि पत्रकारिता का परिचय देकर सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर प्रभाव जमाने, बातचीत को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने तथा कथित तौर पर दबाव बनाने की कोशिश की जाती है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल सरकारी कार्यप्रणाली के लिए चिंता का विषय है, बल्कि ईमानदारी से जनहित की पत्रकारिता करने वालों की प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़े करता है।
इस मामले में परसुडीह निवासी विपिन चंद्र पांडे, पिता विजय पांडे, का नाम लेते हुए आरोप लगाए गए हैं कि वे अपनी मोटरसाइकिल पर डिजिटल मीडिया का स्टिकर लगाकर विभिन्न सरकारी कार्यालयों में जाते हैं और स्वयं को पत्रकार बताते हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि पिता के नाम से सरकारी विभागों में शिकायतें दर्ज कराने और उसके बाद संबंधित विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों से संपर्क करने की गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। हालांकि, शिकायतों की प्रकृति, उनकी सत्यता और पिता-पुत्र की कथित भूमिका की पुष्टि दस्तावेजों से होना आवश्यक है।
पहले संपर्क, फिर रिकॉर्डिंग और उसके बाद विभागों के चक्कर लगाने का आरोप
आरोपों के अनुसार, संबंधित व्यक्ति पहले किसी सरकारी अधिकारी, मंत्री अथवा प्रतिष्ठित व्यक्ति का संपर्क नंबर हासिल करता है। इसके बाद पत्रकार के रूप में परिचय देकर बातचीत करता है। दावा किया गया है कि बातचीत की रिकॉर्डिंग बाद में फेसबुक पर संचालित ‘निगाहें दूर तक’ नामक पेज पर साझा की जाती है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि इसके बाद संबंधित विभागों में पहुंचकर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने और अधिकारियों पर दबाव बनाने की कोशिश की जाती है।
यदि किसी बातचीत को संदर्भ से अलग प्रस्तुत करके किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित की जाती है या किसी अधिकारी को अनुचित लाभ देने के लिए धमकाया जाता है, तो मामले की गंभीरता बढ़ सकती है। लेकिन किसी रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया पर डालना मात्र अवैध वसूली का प्रमाण नहीं है। इसलिए उपलब्ध वीडियो, पूरी बातचीत, संबंधित शिकायतों और अन्य साक्ष्यों की जांच जरूरी है।
किस मीडिया संस्थान से है जुड़ाव जांच में स्पष्ट हो पहचान
मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित व्यक्ति किसी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थान या पंजीकृत समाचार पत्र अथवा चैनल से जुड़ा नहीं है। साथ ही, उसके सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (आईपीआरडी) अथवा प्रेस से संबंधित किसी संस्था से जुड़ाव को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
पथ निर्माण विभाग में ठेकेदारी के निबंधन का भी दावा
आरोपों में यह दावा भी किया गया है कि संबंधित व्यक्ति ने पथ निर्माण विभाग में विभागीय कर्मचारियों पर दबाव बनाकर ठेकेदारी से संबंधित निबंधन कराया है। इस दावे की पुष्टि के लिए विभागीय दस्तावेजों, निबंधन प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों के बयान की आवश्यकता है। यदि निबंधन नियमानुसार हुआ है, तो उसे केवल आरोप के आधार पर गलत नहीं कहा जा सकता। वहीं, यदि किसी प्रकार की अनियमितता या दबाव के प्रमाण मिलते हैं, तो उसकी जांच होनी चाहिए।
जेएनएसी, मानगो नगर निगम, कल्याण विभाग, पथ निर्माण विभाग और भवन निर्माण विभाग सहित अन्य कार्यालयों में संबंधित व्यक्ति की कथित आवाजाही का उल्लेख करते हुए भी जांच की मांग की गई है।
प्रशासन से सवाल—क्या होगी निष्पक्ष जांच ?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए प्रशासन क्या कदम उठाता है? क्या संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों, सरकारी विभागों में की गई शिकायतों, सोशल मीडिया पर साझा की गई रिकॉर्डिंग और ठेकेदारी से जुड़े दावों की जांच होगी? क्या संबंधित विभाग अपने अधिकारियों और कर्मचारियों से इस संबंध में जानकारी लेंगे?
प्रशासन को चाहिए कि वह उपलब्ध शिकायतों और साक्ष्यों के आधार पर मामले की निष्पक्ष जांच करे। यदि किसी व्यक्ति द्वारा पत्रकारिता की आड़ में धमकी, अवैध वसूली या सरकारी कामकाज को प्रभावित करने की पुष्टि होती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही, किसी निर्दोष व्यक्ति को बिना प्रमाण बदनाम करने की कोशिश पर भी उचित संज्ञान लिया जाना चाहिए।
पत्रकारिता की साख बचाना भी जरूरी
पत्रकार का परिचय किसी सरकारी अधिकारी को डराने या निजी लाभ हासिल करने का साधन नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता का असली उद्देश्य जनता की समस्याओं को सामने लाना, भ्रष्टाचार पर सवाल उठाना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। यदि कोई इस पेशे की पहचान का दुरुपयोग करता है, तो उसका नुकसान पूरे पत्रकारिता जगत को उठाना पड़ता है।
जमशेदपुर में उठ रहे इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और ठोस साक्ष्यों से मिलना चाहिए। संबंधित व्यक्ति का पक्ष और प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
